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14 March, 2024, 06:34 AM
Bombay Blood Group का क्या है बॉम्बे शहर से लिंक और क्यों है ये रेयर कैटेगरी में शामिल?
Bombay Blood Group बहुत ही रेयर ब्लड ग्रूप है। डॉ. वाईएम भेंडे ने बॉम्बे में इस ब्लड ग्रूप की खोज की थी। इस रेयर ब्लड ग्रूप के लोग मुंबई शहर में ही सबसे ज्यादा मिलते हैं इसलिए इसे बॉम्बे ब्लड ग्रूप नाम दिया गया। इस ब्लड ग्रूप का जो भी व्यक्ति ब्लड डोनेट करता है उसे स्टोर कर लिया जाता है।
रेयर कैटेगरी में शामिल है बॉम्बे ब्लड ग्रूप।
डॉ. वाईएम भेंडे ने बॉम्बे में इस ब्लड ग्रूप की खोज की थी।
Bombay Blood Group को hh blood group भी कहा जाता है।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप को hh ब्लड ग्रुप के रूप में भी जाना जाता है। यह ब्लड ग्रुप बहुत ही दुर्लभ होता है। बॉम्वे ब्लड ग्रुप की ख़ास बात यह होती है कि इसमें लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर Aऔर B दोनों एंटीजन नहीं होते है। जिसकी वजह से बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति H एंटीजन का उत्पादन करने में असमर्थ हो जाते हैं, जो A,B और O ब्लड ग्रुपिंग सिस्टम के लिए जरूरी होता है। Bombay Blood Group को hh ब्लड ग्रुप या Oh फेनोटाइप के रूप में भी जाना जाता है। दुनियाभर में hh ब्लड ग्रुप 4 मिलियन में से एक का होता है, वहीं भारत में 10,000 लोगों से किसी एक का ये ब्लड ग्रुप हो सकता है।
1952 में बॉम्बे में हुई थी इसकी खोज
रेयर ब्लड ग्रुप में शामिल “Bombay Blood Group की खोज 1952 में डॉ. वाई. एम. भेंडे ने की थी। क्योंकि यह खोज उस वक्त बॉम्बे में हुई थी, इस वजह से इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप का नाम दिया गया। दूसरी वजह यह सबसे पहले बॉम्बे के कुछ लोगों में पाया गया था। यह ब्लड ग्रुप ज्यादातर भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व क्षेत्र के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, चार ब्लड ग्रुप A, B, AB और O सबसे कॉमन हैं। इनमें भी पॉजिटिव वाले अमूमन मिल जाते हैं, लेकिन निगेटिव वालों का मिलना थोड़ा मुश्किल होता है।
जेनेटिक बेसिस
डॉ. संजय कुमार, जनरल फिजिशियन, सिग्नस लक्ष्मी हॉस्पिटल ने बताया कि, 'बॉम्बे ब्लड ग्रुप ऑटोसोमल रिसेसिव तरीके से माता-पिता से मिलता है जिसका मतलब है कि बच्चे को यह स्थिति विरासत में मिलती है, इसके लिए माता-पिता दोनों को म्युटेटेड जीन की कम से कम एक कॉपी (प्रति) रखनी होती है। म्यूटेशन क्रोमोसोम 19 पर स्थित H जीन (FUT1) पर होता है, जिससे H एंटीजन का उत्पादन करने में असमर्थता होती है।
10,000 व्यक्तियों में से 1 में होता है यह ब्लड ग्रुप
बॉम्बे ब्लड ग्रुप होना बहुत ही दुर्लभ बात होती है, सामान्य आबादी में लगभग 10,000 व्यक्तियों में से 1 में यह ब्लड ग्रुप पाया जाता है। हालांकि विभिन्न जातीय समूहों और भौगोलिक क्षेत्रों में इसकी व्यापकता अलग-अलग है। यह आमतौर पर कुछ खास आबादी में पाया जाता है, जैसे कि दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में बॉम्बे ब्लड ग्रुप होता है।
ब्लड ट्रांसफ्यूजन में होने वाली समस्याएं
इस ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति सिर्फ दूसरे बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले से ही ब्लड ले सकते हैं। इसलिए इस ब्लड ग्रुप का जो भी व्यक्ति ब्लड डोनेट करता है, उसे स्टोर कर लिया जाता है। किसी दूसरे ग्रुप का खून चढ़ाने पर बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मरीज की जान खतरे में आ सकती है। क्योंकि बॉम्बे ब्लड ग्रुप बहुत दुर्लभ है, इसलिए डोनर को ढूंढना बेहद मुश्किल हो सकता है।
ब्लड टाइप का महत्व
लोगों को अपना ब्लड ग्रुप पता होना चाहिए, खासकर अगर उनका ब्लड ग्रुप बॉम्बे है, क्योंकि यह इमरजेंसी स्थिति या सर्जरी के मामले में इलाज को बहुत प्रभावित कर सकता है। ब्लड टाइप टेस्ट लाल रक्त कोशिकाओं पर A, B और H एंटीजन की उपस्थिति निर्धारित कर सकते हैं, जिससे हेल्थकेयर प्रोफेशनल उचित देखभाल प्रदान कर सकते हैं।
क्लीनिकल जरूरतें
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की दुर्लभता के कारण इस ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों को जरूरत पड़ने पर ब्लड प्रोडक्ट्स तक पहुंचने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स को इस दुर्लभ ब्लड टाइप के बारे में जागरूक होना चाहिए और बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मरीजों के मैनेजमेंट के लिए प्रोटोकॉल रखना चाहिए।
Source:
https://www.jagran.com/lifestyle/health-what-is-bombay-blood-group-and-why-its-rare-23674405.html




